सिनेमा… सपनों की दुनिया। एक ऐसी दुनिया जिसने पीढ़ियों को प्रेरित किया है। लेकिन इस दुनिया की चकाचौंध के पीछे छिपी है एक अनकही कहानी – महिलाओं के संघर्ष और असाधारण योगदान की कहानी। यह कहानी है उन अभिनेत्रियों, निर्देशकों और लेखिकाओं की जिन्होंने सिनेमा के इतिहास को अपने दम पर एक नई दिशा दी। भारतीय सिनेमा की शुरुआत में, महिलाओं का अभिनय करना सामाजिक रूप से अस्वीकार्य था। 1913 में दादासाहेब फाल्के को अपनी पहली फिल्म राजा हरिश्चंद्र के लिए एक महिला किरदार के लिए पुरुष कलाकार को लेना पड़ा। लेकिन यह स्थिति जल्द ही बदलने वाली थी। इस चुनौती को स्वीकार किया दुर्गाबाई कामत और उनकी बेटी कमलाबाई गोखले ने। 1913 में आई फिल्म मोहिनी भस्मासुर में दुर्गाबाई भारत की पहली महिला अभिनेत्री बनीं और कमलाबाई पहली बाल कलाकार। समाज के तानों और बहिष्कार के बावजूद, उन्होंने अभिनय के क्षेत्र में महिलाओं के लिए दरवाजे खोले।

इसके बाद देविका रानी जैसी अभिनेत्रियों ने भारतीय सिनेमा को एक नया आयाम दिया। उन्हें भारतीय सिनेमा की पहली महिला के रूप में जाना जाता है। उन्होंने 1936 में अछूत कन्या जैसी सामाजिक रूप से प्रगतिशील फिल्मों में अभिनय किया और बॉम्बे टॉकीज स्टूडियो की प्रमुख बनकर सिनेमा निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दूसरी ओर, 1935 में फिल्म हंटरवाली में फियरलेस नाडिया ने भारतीय सिनेमा की पहली स्टंट वुमन के रूप में अपनी पहचान बनाई, जिन्होंने पर्दे पर महिला की ‘अबला नारी’ की छवि को तोड़ा। अभिनय के साथ-साथ, महिलाओं ने कैमरे के पीछे भी अपनी जगह बनानी शुरू कर दी थी। फातमा बेगम भारत की पहली महिला निर्देशक थीं, जिन्होंने 1926 में बुलबुल-ए-परिस्तान जैसी fantasy फिल्म का निर्देशन किया। जहानआरा एक और मिसाल थीं – एक प्रतिभाशाली गायिका, संगीतकार, अभिनेत्री और निर्देशक, जिन्होंने 1935 में तलाश-ए-हक जैसी फिल्मों का निर्माण और निर्देशन किया। वे अभिनेत्री नर्गिस की माँ थीं और उन्होंने भारतीय सिनेमा को कई तरह से समृद्ध किया। समय के साथ, अभिनेत्रियों ने अपनी भूमिकाओं के माध्यम से भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति को दर्शाया। (1957) में फिल्म मदर इंडिया में नर्गिस ने एक अकेली माँ के संघर्ष और दृढ़ संकल्प को अमर कर दिया। 1963 में बंदिनी में नूतन ने एक महिला के जटिल

70 और 80 के दशक में, शबाना आज़मी और स्मिता पाटिल जैसी अभिनेत्रियों ने समानांतर सिनेमा में यथार्थवादी और सशक्त महिला किरदारों को जीवंत किया। ‘अर्थ’ और ‘भूमिका’ जैसी फिल्मों ने महिलाओं के अस्तित्व और उनकी पहचान से जुड़े गंभीर सवाल उठाए। सिनेमा की कहानी को आकार देने में महिला लेखिकाओं और निर्देशकों का योगदान अमूल्य है। इस्मत चुगताई जैसी लेखिकाओं ने अपनी प्रगतिशील कहानियों से सिनेमा को एक नई दिशा दी। उनकी कहानी पर आधारित 1973 में आई फिल्म

साई परांजपे ने 1980 में स्पर्श और 1981 में चश्मे बहादुर जैसी फिल्मों के साथ निर्देशन में अपनी एक अलग पहचान बनाई। वहीं अपर्णा सेन ने ‘36 चौरंगी लेन’ जैसी संवेदनशील फिल्मों के माध्यम से भारतीय सिनेमा को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत किया। आज की महिला निर्देशक और पटकथा लेखक इस विरासत को और भी आगे बढ़ा रही हैं। जोया अख्तर, मेघना गुलज़ार, गौरी शिंदे और अलंकृता श्रीवास्तव जैसी फिल्मकार ऐसी कहानियां कह रही हैं जो महिलाओं के दृष्टिकोण को केंद्र में रखती हैं। 2013 में आई फिल्म ‘क्वीन’ में एक लड़की की आत्म-खोज की यात्रा हो, कहानी में एक गर्भवती महिला का अदम्य साहस हो, ‘लिपस्टिक अंडर माय बुर्का’ में महिलाओं की दमित इच्छाओं का चित्रण हो या 2020 में आई फिल्म ‘थप्पड़’ में घरेलू हिंसा के खिलाफ एक मज़बूत आवाज़ – ये फिल्में सिर्फ मनोरंजन नहीं करतीं, बल्कि समाज को आईना भी दिखाती हैं।
आलिया भट्ट ने ‘गंगूबाई काठियावाड़ी’ में अपने अभिनय से एक महिला के शक्ति और सम्मान की लड़ाई को पर्दे पर जीवंत कर दिया, तो वहीं ‘डार्लिंग्स’ में एक निर्माता के रूप में घरेलू हिंसा जैसे गंभीर विषय पर एक साहसिक कहानी दर्शकों के सामने रखी। यह नया दौर महिला किरदारों की बहुआयामी प्रतिभा का लोहा मान रहा है। कियारा आडवाणी की 2024 में आई ‘सप्ता सागरदा चे एलो – साइड बी’ जैसी फिल्मों में हल्के अंदाज़ में भी सशक्तिकरण का गहरा संदेश देती हैं। वहीं ‘कू’ जैसी फिल्में महिला दोस्ती और उनके सपनों की उड़ान को कमर्शियल सिनेमा के केंद्र में लाती हैं। अभिनेत्रियां अब सिर्फ रोमांटिक किरदारों तक सीमित नहीं हैं। ‘जवान’ जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्म में एक दमदार पुलिस अफसर का किरदार निभाती हैं। ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ने शेफाली शाह और विद्या बालन जैसी अभिनेत्रियों को ‘दिल्ली क्राइम’ और ‘जलसा’ जैसे प्रोजेक्ट्स के साथ और भी प्रयोगात्मक भूमिकाएं निभाने का अवसर दिया है। सिनेमा में महिलाओं की यह यात्रा आसान नहीं रही है। उन्हें सामाजिक मानदंडों, लैंगिक भेदभाव और अनगिनत चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। लेकिन हर बाधा को पार कर, उन्होंने अपनी प्रतिभा और दृढ़ निश्चय से अपनी एक अलग पहचान बनाई है। अभिनेत्रियों, निर्देशकों और लेखिकाओं के रूप में उनका योगदान सिर्फ सिनेमा के पर्दे तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज में महिलाओं के सशक्तिकरण का प्रतीक भी है। उनकी कहानियां प्रेरित करती हैं और यह याद दिलाती हैं कि कला और रचनात्मकता किसी भी बंधन से परे हैं।
उन सभी महिलाओं को सलाम जिन्होंने भारतीय सिनेमा को एक नई पहचान दी।.


