कभी अपने पोलियोग्रस्त बेटे को लेकर महमूद ने एक मूवी बनाई थी ‘कुंवारा बाप, ये मूवी थोड़ी सी कॉमेडी के साथ संदेश देने वाली इमोशनल ट्रेजेडी थी. अब 51 साल बाद नेटफ्लिक्स पर कुणाल खेमू की 6 एपिसोड्स की सीरीज आई है सिंगल बाप. वो मूवी थी, ये वेबसीरीज है, उसमें रिक्शा वाला हीरो था, इसमें एक वाइन शॉप वाले का बेटा हीरो है, उस मूवी में हीरोइन थी नहीं, इसमें दो-दो हीरोइन हैं और तीसरी एक बुआ भी. उसमें बच्चे के असली मां बाप बाद में बच्चे को पाने की लड़ाई लड़ते हैं, इसमें वो नजर ही नहीं आते. उसमें संदेश पोलियो के लिए था, तो इसमें मर्दों की जिम्मेदारियों के लिए है हालांकि दोनों में ही नायक का अपना बच्चा नहीं होता.
इंजीनियरिंग में एक मूलमंत्र सबको बताया जाता है कि कई भी मशीन आदर्श नहीं होती, उसमें घर्षण (फ्रिक्शन) में ऊर्जा क्षय होती ही है. कभी आदर्शवादी किरदारों के लिए प्रसिद्ध फिल्मी दुनियां में भी अब उन्हीं नायकों का चलन है, जिसमें वो अपनी कमियों पर दुखी नहीं होता, ना छुपाता ही है. ऐसे ही एक लापरवाह, इमोशनल व जिद्दी लड़के गौरव गहलौत (कुणाल खेमू) की कहानी है ‘सिंगल पापा’. ऐसे ‘कूल किरदार आजकल पसंद भी किए जाने लगे हैं. पहले जिद थी अपर्णा (ईशा तलवार) से शादी की, फिर पिता बनने की. जबकि ईशा अभी बच्चा नहीं चाहती तो इसी बात पर दोनों में तलाक हो जाता है. गौरव के पिता जतिन (मनोज पाहवा) और मां पूनम (आयशा रजा) और नमृता (प्राजक्ता कोली) भी इसे नहीं रोक पाते.

अचानक एक रात गौरव की कार में कोई अपना नवजात बच्चा छोड़ देता है, अमूल के गत्ते में. सो वो उसका नाम ‘अमूल’ रख देता है. जाहिर है अमूल से टाईअप होगा. लेकिन उस बच्चे को बच्चों के लिए काम करने वाले संगठन की प्रमुख रोमिला नेहरा (नेहा धुपिया) अपने अनाथाश्रम में ले जाती है और फिर शुरू होती है बच्चे को गोद लेने की कश्मकश. रोमिला लापरवाह और सिंगल बाप गौरव को अमूल को गोद देने को राजी नहीं है, इधर अमूल की सच्चाई उनका परिवार किसी को बताना नहीं चाहता क्योंकि बेटी नमृता की शादी टूटने का डर है. प्राजक्ता की ननद फिल्म में दूसरी हीरोइन के तौर पर एंट्री करती है. बीकेजी जैसे बाबा के किरदारो को छोड़ दिया जाए तो ये सीरीज घर के हलके फुलके माहौल में देखने लायक है, हालांकि कुछ सींस या डायलॉग्स बच्चो के सामने परेशान भी कर सकते हैं. सीरीज के डायलॉग्स को चुटीला बनाने की कोशिश भी साफ दिखती है.

कहानी में सीआईडी के दया भी हैं, मेल नैनी के तौर पर कोशिश की गई है कि सिचुएशनल कॉमेडी के साथ साथ ये संदेश भी जाए कि एक मर्द अकेला भी बच्चों को पाल सकता है लेकिन दूसरी तरफ ये भी दिखाते हैं कि वो मर्द इतना लापरवाह है कि ना पत्नी के तलाक से परेशान होता है और ना एक पल के लिए बाद में भी दुखी होता है. ये अलग बात है कि कुणाल खेमू जबरदस्त तरीके से अपने किरदार में घुस गए हैं. नकली दांतों के बावजूद मनोज पाहवा अपने इस हरियाणवी किरदार में फुल मूड में हैं. ईशा, प्राजक्ता, आयशा, सुशील नैय्यर, अंकुर राठी सभी अपने अपने किरदारों में काफी मेहनत करते दिखे हैं, ज्यादा असर कभी ग्लेमरस किरदारों में दिखने वाली नेहा धुपिया अपने एक्टिविस्ट किरदार के साथ छोड़ती हैं. समाज तेजी से बदल रहा है तुषार कपूर और करण जौहर जैसे असली जिंदगी के किरदार भी सामने आने लगे हैं, जिन्हें आज सिंगल पापा के तौर पर जाना जाता है. ऐसे विषयों को लेकर कॉमेडी में लपेटकर फिल्मवाले समाज में स्वीकार्यता दिलाने का काम करते हैं, लिव इन में रहना, टेस्ट ट्यूब बेबी, कम उम्र के लड़के या लड़की से इश्क लड़ाना, समलैंगिक जोड़ों के रिश्ते जैसे तमाम ऐसे विषय हैं. ये पता करना मुश्किल है कि आम समाज इन्हें केवल आनंद के लिए देखता है, या उस पर कोई असर भी होता है. हालांकि असर कम हो या ज्यादा पड़ता जरूर है.



