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सिनेमा में मां का बदलता हुआ स्वरूप

डॉ. शबीना शेख

सहायक प्रोफेसर, देशबंधु कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय

भारतीय संस्कृति में माँ केवल जन्म देने वाली स्त्री नहीं, बल्कि सृजन, संरक्षण, त्याग, करुणा और शक्ति का प्रतीक मानी जाती है। वैदिक साहित्य से लेकर पुराणों और भारतीय लोक परंपराओं तक माँ को देवी, धरती और जीवनदाता के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त है। भारतीय समाज की इसी सांस्कृतिक चेतना का गहरा प्रभाव भारतीय सिनेमा और मीडिया पर भी दिखाई देता है। सिनेमा समाज का दर्पण माना जाता है। जिस प्रकार समाज समय के साथ बदलता है, उसी प्रकार सिनेमा में प्रस्तुत पात्रों की छवि भी परिवर्तित होती रहती है। भारतीय फिल्मों में माँ का चरित्र इस परिवर्तन का सबसे सशक्त उदाहरण है। लगभग एक शताब्दी के भारतीय सिनेमा के इतिहास में माँ की छवि ने त्यागमयी देवी, संघर्षशील अभिभावक, परिवार की आधारशिला, कामकाजी महिला, अकेली माँ और आत्मनिर्भर व्यक्तित्व जैसे अनेक रूप धारण किए हैं ।

भारतीय सिनेमा के प्रारंभिक दौर में माँ का चरित्र आदर्शवाद और नैतिक मूल्यों का प्रतिनिधित्व करता था। उस समय समाज पारिवारिक मूल्यों और संयुक्त परिवार व्यवस्था पर आधारित था। इसलिए फिल्मों में भी माँ को परिवार की आत्मा के रूप में प्रस्तुत किया गया। वह अपने सुख-दुःख की परवाह किए बिना परिवार की रक्षा करती थी, बच्चों के संस्कारों का निर्माण करती थी और पति तथा परिवार के सम्मान को सर्वोपरि मानती थी। उसकी व्यक्तिगत इच्छाएँ और महत्वाकांक्षाएँ लगभग अदृश्य रहती थीं। इस दौर में माँ का चरित्र भारतीय संस्कृति की उस पारंपरिक अवधारणा को मजबूत करता था जिसमें मातृत्व त्याग और सेवा का पर्याय माना जाता था ।

भारतीय सिनेमा में माँ की सबसे प्रभावशाली और स्थायी छवि फिल्म ‘मदर इंडिया’ के माध्यम से सामने आई। इस फिल्म में नरगिस द्वारा निभाया गया ‘राधा’ का चरित्र केवल एक माँ नहीं बल्कि भारतीय नारी के आदर्श स्वरूप का प्रतीक बन गया। राधा कठिन परिस्थितियों में अपने बच्चों का पालन-पोषण करती है, पूरे गाँव की जिम्मेदारी उठाती है और अंततः न्याय तथा नैतिकता की रक्षा के लिए अपने ही पुत्र के विरुद्ध कठोर निर्णय लेती है। इस चरित्र ने भारतीय समाज में माँ को नैतिक शक्ति, धैर्य और आत्मबल की सर्वोच्च प्रतिमूर्ति के रूप में स्थापित किया। यही कारण है कि आज भी ‘मदर इंडिया’ भारतीय सिनेमा में मातृत्व के सबसे सशक्त प्रतिनिधित्वों में गिनी जाती है ।

सत्तर और अस्सी के दशक में हिन्दी फिल्मों में माँ का चरित्र भावनात्मक केन्द्र बन गया। इस काल में निरूपा रॉय, सुलोचना लाटकर, अचला सचदेव और लीला मिश्रा जैसी अभिनेत्रियों ने माँ की भूमिका को नई ऊँचाइयाँ प्रदान कीं। विशेष रूप से निरूपा रॉय ने भारतीय सिनेमा में पीड़ित, संघर्षशील और त्यागमयी माँ की ऐसी छवि बनाई कि वे दर्शकों के मन में ‘भारतीय माँ’ का पर्याय बन गईं। अमिताभ बच्चन की अनेक फिल्मों में उनकी माँ की भूमिका ने माँ और पुत्र के भावनात्मक संबंधों को अमर बना दिया। इसी दौर के अनेक संवाद, जैसे “मेरे पास माँ है”, भारतीय जनमानस की स्मृति का स्थायी हिस्सा बन गए। यह केवल संवाद नहीं था, बल्कि भारतीय समाज में माँ की सर्वोच्च नैतिक सत्ता का सांस्कृतिक प्रतीक बन गया ।

समय के साथ भारतीय समाज में आर्थिक उदारीकरण, शहरीकरण और शिक्षा के विस्तार ने पारिवारिक संरचना को प्रभावित किया। इसका प्रभाव फिल्मों में भी दिखाई दिया। नब्बे के दशक में माँ का चरित्र केवल त्याग और दुःख तक सीमित नहीं रहा। फरीदा जलाल और रीमा लागू जैसी अभिनेत्रियों ने ऐसी माँ की छवि प्रस्तुत की जो अपने बच्चों की मित्र भी थी और उनकी भावनाओं को समझने वाली संवेदनशील अभिभावक भी । दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे, कुछ-कुछ होता है, मैंने प्यार किया और हम आपके हैं कौन जैसी फिल्मों में माँ परिवार की भावनात्मक धुरी तो बनी रही, लेकिन अब वह मुस्कुराती, संवाद करती और बच्चों के निर्णयों में सहभागी भी दिखाई देने लगी। यह परिवर्तन भारतीय मध्यमवर्गीय परिवारों में बदलते रिश्तों का प्रतिबिंब था ।

इक्कीसवीं सदी में भारतीय सिनेमा ने माँ की छवि को और अधिक यथार्थवादी तथा बहुआयामी बनाया। अब माँ केवल परिवार की संरक्षक नहीं, बल्कि अपनी स्वतंत्र पहचान रखने वाली महिला के रूप में भी प्रस्तुत होने लगी। पा में डॉ. विद्या एक सफल चिकित्सक होने के साथ-साथ अकेले अपने पुत्र का पालन-पोषण करती है । हेलीकॉप्टर ईला में माँ अपने बेटे के साथ संबंधों को सँभालते हुए अपनी अधूरी शिक्षा और संगीत के सपनों को पुनः जीवित करती है। त्रिभंग जैसी फिल्मों में माँ-बेटी के जटिल संबंधों और पीढ़ियों के बीच के वैचारिक संघर्ष को संवेदनशील ढंग से चित्रित किया गया है। वहीं मिमी ने सरोगेसी जैसे जटिल सामाजिक विषय के माध्यम से मातृत्व की नई परिभाषा प्रस्तुत की। इन फिल्मों ने यह स्पष्ट किया कि आधुनिक माँ केवल परिवार के लिए जीने वाली स्त्री नहीं, बल्कि अपने अधिकारों, आकांक्षाओं और निर्णयों वाली स्वतंत्र व्यक्तित्व भी है ।

हाल के वर्षों में भारतीय सिनेमा ने माँ को संघर्ष, प्रतिरोध और न्याय की लड़ाई लड़ने वाली महिला के रूप में भी चित्रित किया है। मॉम में श्रीदेवी का पात्र अपनी बेटी के साथ हुए अन्याय का प्रतिशोध लेने के लिए सामाजिक व्यवस्था को चुनौती देता है। जज़्बा में मातृत्व न्याय की प्रेरक शक्ति बनकर उभरता है। मिसेज़ चटर्जी वर्सेस नॉर्वे में एक भारतीय माँ अपने बच्चों की अभिरक्षा के लिए विदेशी न्याय व्यवस्था से संघर्ष करती है। इसी प्रकार पंगा में माँ अपने अधूरे खेल जीवन को दोबारा शुरू करती है, जबकि सुखी में एक गृहिणी वर्षों बाद स्वयं के अस्तित्व और इच्छाओं को पहचानने का प्रयास करती है। इन फिल्मों ने यह स्थापित किया कि आधुनिक मातृत्व केवल त्याग नहीं, बल्कि आत्मसम्मान, संघर्ष और आत्मसाक्षात्कार का भी प्रतीक है ।

भारतीय सिनेमा में माँ के चरित्र के साथ-साथ उससे जुड़े गीत और संवाद भी सामाजिक स्मृति का हिस्सा बन चुके हैं। “लुका-छुप्पी बहुत हुई”, “मेरी माँ”, “ममता के आँचल में पला”, “तू कितनी भोली है” जैसे गीतों ने मातृत्व की संवेदनाओं को करोड़ों दर्शकों तक पहुँचाया। इन गीतों में माँ केवल परिवार की सदस्य नहीं, बल्कि भावनात्मक सुरक्षा और निःस्वार्थ प्रेम का स्रोत बनकर सामने आती है। इसी प्रकार फिल्मों के संवादों ने भी माँ को भारतीय सामाजिक चेतना के केन्द्र में स्थापित किया ।

नई मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म के विस्तार ने भी मातृत्व की छवि को नया आयाम दिया है। वेब सीरीज़, ओटीटी मंचों और सोशल मीडिया ने पारंपरिक आदर्शवादी माँ के स्थान पर वास्तविक जीवन की चुनौतियों से जूझती महिलाओं की कहानियों को स्थान देना प्रारम्भ किया है। आज की माँ नौकरी करती है, आर्थिक निर्णय लेती है, अकेले बच्चों का पालन-पोषण करती है, सामाजिक पूर्वाग्रहों से संघर्ष करती है और अपनी व्यक्तिगत पहचान भी बनाए रखती है। यह परिवर्तन केवल मनोरंजन उद्योग का नहीं, बल्कि भारतीय समाज में महिलाओं की बदलती भूमिका का भी प्रमाण है ।

वस्तुतः भारतीय सिनेमा में माँ की छवि का विकास भारतीय समाज के विकास का सांस्कृतिक इतिहास भी है। प्रारम्भिक दौर की त्यागमयी और आदर्शवादी माँ से लेकर आज की आत्मनिर्भर, आत्मविश्वासी और निर्णयक्षम माँ तक की यात्रा भारतीय समाज में महिलाओं की बदलती स्थिति, शिक्षा, आर्थिक भागीदारी और सामाजिक चेतना का दर्पण है। यद्यपि आज भी अनेक फिल्मों में पारंपरिक मातृत्व के तत्व विद्यमान हैं, फिर भी आधुनिक सिनेमा माँ को एक पूर्ण मनुष्य के रूप में देखने लगा है, जिसकी अपनी आकांक्षाएँ, संघर्ष, सफलताएँ और असफलताएँ हैं। यही परिवर्तन भारतीय सिनेमा और मीडिया की सबसे बड़ी उपलब्धि है। माँ अब केवल परिवार की धुरी नहीं, बल्कि समाज परिवर्तन की सक्रिय सहभागी और अपनी नियति स्वयं लिखने वाली सशक्त व्यक्तित्व के रूप में स्थापित हो चुकी है ।